गर्मियों की बारिश चुपचाप उतरती है जैसे थकी हुई शाम की कोई धीमी आह। आसमान के चेहरे पर धुंधली सी उदासी और हवा में भीगी हुई खामोशी तैरती है।

धूल से भरी धरती पर जब पहली बूंद गिरती है तो मिट्टी से उठती खुशबू किसी पुरानी याद जैसी लगती है।

पेड़ों की शाखें हल्के से कांपती हैं बादल धीमे धीमे बहते रहते हैं। रोशनी कहीं धुंध में खो जाती है और मौसम कुछ कह कर भी चुप रहता है।

गर्मियों की यह बारिश ना पूरी तरह खुश होती है ना पूरी तरह उदास। बस भीगी हुई हवा में एक हल्की सी रुमानियत और गहरी सी तन्हाई छोड़ जाती है।