Baarish
09 Apr 2026गर्मियों की बारिश चुपचाप उतरती है जैसे थकी हुई शाम की कोई धीमी आह। आसमान के चेहरे पर धुंधली सी उदासी और हवा में भीगी हुई खामोशी तैरती है।
धूल से भरी धरती पर जब पहली बूंद गिरती है तो मिट्टी से उठती खुशबू किसी पुरानी याद जैसी लगती है।
पेड़ों की शाखें हल्के से कांपती हैं बादल धीमे धीमे बहते रहते हैं। रोशनी कहीं धुंध में खो जाती है और मौसम कुछ कह कर भी चुप रहता है।
गर्मियों की यह बारिश ना पूरी तरह खुश होती है ना पूरी तरह उदास। बस भीगी हुई हवा में एक हल्की सी रुमानियत और गहरी सी तन्हाई छोड़ जाती है।